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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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13 March 2010

एक आंतकी का पति ओर बुद्ध की मुस्कान -उदय प्रकाश.

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उदय प्रकाश...... नाम लिखना जैसे शब्दों के कई रेखा चित्रों के बण्डल को एक साथ संभालना है...उन्ही का ..एक रेखा चित्र यहाँ भी है....


सत्ताओं ने एक ऐसा समय रचा है हमारे इर्द-गिर्द कि सारे दुस्वप्न और आशंकाएं एक-एक कर सच होने लगती हैं।
उस रोज़ जब पोखरण में परमाणु के धमाके हुए उसके बाद के पंद्रह दिन पाकिस्तान में उथल-पुथल के थे। अगर सियासत के खिलाड़ी सरहद के इस पार अपनी हिंसा की ताकत का परीक्षण कर रहे थे तो सरहद के उस पार के खिलाड़ी इसे अपने लिए एक सुनहरा मौका मान रहे थे।
निर्वासन में रह रहीं बेनज़ीर भुट्टो ने तुरत बयान दिया: ''हिंदुस्तान के परमाणु केंद्रों को खत्म करने के लिए फौरन आकस्मिक हमला (preemptive action) कर देना चाहिए।''
२४ साल पहले, १९७४ में जब इसी पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण 'बुद्ध की मुस्कान' हुआ था, तब बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने कहा था:''पाकिस्तान हज़ार साल तक घास खा कर रह लेगा लेकिन परमाणु बम ज़रूर बनाएगा।'' उस वक्त तक पेंटागन के शोध-सैन्य-बौद्धिक प्रयोगशालाओं में से कोई सैम्युएल हंटिंग्टन नहीं निकला था, लेकिन 'सभ्यताओं' की मुठभेड़ और कबीलाई टकराहट की बात इन सियासत के खूनी खिलाड़ियों के दिमाग में तब भी पैदा हो रही थी।
तब तक पाकिस्तान में सत्ता की कुर्सी के भूखे ज़िया उल हक ने बेनज़ीर भुट्टो के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी पर नहीं लटकाया था। वे ज़िंदा थे और १९७१ के युद्ध में भारत के हाथों ऐतिहासिक हार के घावों को जेल में सहलाते हुए किसी मज़हबी फ़ैनेटिक या ओसामा बिन लादेन की ज़ुबान में बोल रहे थे : ''अब ईसाइयों के पास बम है, यहूदियों के पास बम है..! और अब हिंदुओं के पास भी हो गया है..। पाकिस्तान को इस्लाम का पहला बम बनाने के लिए सब कुछ कुर्बान कर देना चाहिए।''
(कई बार सभ्यताओं का इतिहास अशक्त और निहत्थे मनुष्यों और प्रकृति के विरुद्ध विनाश का षड़यंत्र रचने वाले पात्रों की नियति के साथ भी वैसा ही व्यवहार करता है। आज आप खुद सरहद के इधर और उधर के इन सभी पात्रों के जीवन के अंत के दहशतनाक दृश्यों को याद करिए। भुट्टो, ज़िया-उल-हक, इंदिरा गांधी, बेनज़ीर की ज़िंदगियों के आखिरी दृश्य ? ..उफ़...! क्या निर्दोष मनुष्यता और समूची प्रकृति के विरुद्ध विनाश के काम में लगे सत्ताओं के उन्मादी कोई पाठ कभी सीखेंगे ?
..... शायद अहिंसा और करुणा के जीवन और उत्तर-जीवन के प्रतीक बुद्ध के चेहरे में भी, उनके जीवन का वैसा हौलनाक अंत देख कर मुसकान नहीं, आंखों में आंसू ही रहे होंगे...!)

बहरहाल, १९९८ की उस तपती मई की दोपहर, जब भिंड-मुरैना के बीहड़ में, सड़क से कुछ हट कर एक 'मारुति-८००' खड़ी थी और एक पेड़ की वत्सल छांह के नीचे, आग की लपटों वाली लू से बचते हुए, एक दर-ब-दर परिवार आलू-पूरी और अचार खा रहा था।
उस दिन आलू और पूरी में अनोखा-अपूर्व स्वाद था।
आम के अचार का एक टुकड़ा कुतरते ही, बचपन में, अतीत की धुंधली होती स्मृतियों में कहीं बहुत दूर छूट गयी अमराइयों का स्वाद और गंध देह के भीतर तक भर जाती थी...।
वहां से कुछ ही हट कर, झाड़ियों के पास एक खरगोश, जिसका नाम चकमक और एक पामरेनियन, जिसका नाम लाइका था, लुका-छिपी या चोर-सिपाही खेल रहे थे....
और जहां से कुछ सौ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में, दो देशों के सरहद पर बमों के धमाके हो रहे थे...
और वहां से कई समुद्र पार अमेरिका के किसी किसी उत्तरी शहर मे एक घबराहट औ बेचैनी से भरे सेमिनार के खत्म हो जाने के बाद, एक डरी हुई सुंदर उदास लड़की, एक डरे हुए, चिंतित और परेशान खूबसूरत लड़के का हाथ थामे प्रेस कांफ़्रेंस में कह रही थी :
''हां, यह सच है कि हम एक दूसरे को बेइंतेहा प्यार करते हैं।..और आज की तारीख में इसे दुनिया के सामने ज़ाहिर करते हैं।..और हमारा यह प्यार बमों और विनाश के खिलाफ़ है...!''
यह लड़की और यह लड़का उन दो देशों के थे, जिन्हें राजनीति ने एक ही शरीर को चीर कर अलग किया था। जैसे दो गुर्दों, आंखों या कलेजों के बीच एक सरहद की कांटेदार दीवार खड़ी कर दी गयी हो।
यह लड़की और वह लड़का उन दो अलग-अलग धर्मों के थे, जिन्हें एक-दूसरे का दुश्मन और खून का प्यासा बनाने में दोनों तरफ़ की सियासत और मीडिया और कार्पोरेट कंपनियां दिन रात लगी हुईं थीं।

बस वही हुआ।
मुश्किल से एक पखवाड़ा बीता और अमेरिका के एक टोही सैटेलाइट ने पाकिस्तान की चगाई की पहाड़ियों वाले इलाकों में कुछ रहस्य भरी गतिविधियों के इमेज दर्ज किये।
हिंदुस्तान में सांप्रदायिक राजनीतिक षडयंत्रों से दो सांसदों की ताकत को बढा़ते हुए संसद में बहुमत और सरकार बना लेने वाली पार्टी का प्रधानमंत्री अपनी विरोधी पार्टी के १९७१-७४ के इतिहास को दुहराते हुए इतिहास में अपने कमज़ोर घुटनों लेकिन हिंसा और उन्माद से भरी महत्वाकांक्षा की हिंसा के बल पर प्रवेश करना चाहता था।
इसके लिए जिस अंधराष्ट्रवाद को सामूहिक हिस्टीरिया की तरह मीडिया, अखबार और सरकार द्वारा फैलाया जा रहा था, उसकी शुरुआत सरहद के उस पार भी हो गयी।
पाकिस्तान के विदेशमंत्री अयूब खान ने घोषणा की :''कैबिनेट की बैठक ने फैसला लिया है कि पाकिस्तान को भी बम विस्फोट करना होगा। बस अब तारीख तय करना बाकी है।''
१८ मई को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के दफ़्तर में बीस आला लोग इकट्ठा थे। इनमें प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, विदेशमंत्री के अलावा तीनों फौज़ों के मुखिया और परमाणु वैग्यानिक शामिल थे।
जिस तरह हिंदुस्तान का बालीवुड 'खान-स्टार्स' के दम पर अपना धंधा चलाता है, पाकिस्तान के इस न्यूक्लियर ताकत के पीछे भी असली वैग्यानिक सितारे 'खान' ही थे। डाक्टर अब्दुल कादिर खान और डाक्टर मुनीर खान।
डाक्टर अब्दुल कादिर खान ने बयान दिया :'' हम १० दिन के भीतर हिंदुस्तान को दिखा देंगे कि हम क्या कर सकते हैं।''
..और २८ मई को तड़के अचानक पाकिस्तान ने अपने सारे संपर्क संसार से तोड़ लिए। उसके सारे फौज़ी हवाई अड्डों में एफ़-१६ और एफ़-७ एम.पी. लडाकू जहाज़ों को पायलेट के साथ मुस्तैद कर दिया गया कि बस सिग्नल मिलते ही वे टेक आफ़ करें।
चगाई की पहाड़ियों मे वह एक साफ़-शफ़्फ़ाफ़ सुबह थी। धूप खिली हुई थी और चमक रही थी। रात में उस इलाके में रहने वाले लोगों को वहां से हटा दिया गया था। सिर्फ़ बीस लोग उस 'शून्य-क्षेत्र' (ज़ीरो-ज़ोन) में मौज़ूद थे। इन बीस लोगों में सबसे युवा था मोहम्मद अरशद। वह वैग्यानिक, जिसकी विशेष्यग्यता 'ट्रिगर-टेक्नालाजी' यानी 'लिब-लिबी तकनीक' के लिए जानी जाती थी।
उसी मोहम्मद अरशद को आदेश दिया गया।
३ बज कर १६ मिनट पर उसने 'या इलाहा-इल्ललाह ...' की फ़ुसफ़ुसाहट के साथ मशीन की 'लिब-लिबी' दबाई और वह पाकिस्तान के इतिहास में दाखिल हो गया।
विस्फोट हो चुका था। रास कोह के काले ग्रेनाइट के पहाड़ सफ़ेद हो गये थे और थर्रा रहे थे। धरती कांप रही थी। धूल और धुएं के गुबारों ने आसमान को ढंक लिया था। एक के बाद एक पांच धमाके। विनाश की ताकत के परीक्षण के सबूत। बीस मुस्कुराती आंखें उन्हें संतोष के साथ घूर रही थीं।
उनके लिए यह पाकिस्तान के तवारीख के सबसे सुनहरे और सबसे महान पल थे। पाकिस्तान पहला दुनिया के 'न्यूक्लियर क्लब' का सातवां सदस्य बन गया था।
हिंदू, ईसाई, यहूदी, बौद्ध बमों के बाद पहला इस्लामी बम बनाने वाला देश।
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने टेलीविज़न के प्रसारण में घोषणा की: ''आज हमने हिसाब बराबर कर लिया। हिंदुस्तान की मौज़ूदा सरकार के हाथों हमें यह कदम उठाने को मज़बूर होना पड़ा। हमारी सुरक्षा और अस्तित्व के सामने बहुत बड़ा खतरा मौज़ूद था। हम अपने वैग्यानिकों खासतौर पर डाक्टर अब्दुल कादिर......!''
इस घोषणा के ठीक पांच घंटे बाद इस्लामाबाद में भारत के राजदूत को बुला कर कहा गया : हमारे पास पक्की सूचना है कि हिंदुस्तान हमारे पर परमाणु केंद्रों पर हमला करने की बड़ी तैयारी में है। ऐसी हरकत वह ना करे वर्ना फ़ौरन तबाह्कून जवाबी कार्रवाई की जाएगी।''

इसके बाद पाकिस्तान में इमर्जेंसी लगा दी गयी और वहां की जनता के सारे अधिकार रद्द कर दिये गये।

हिंदुस्तान की डरी हुई अंग्रेज़ी की लेखिका अरुंधती राय ने किसी की भी स्मृतियों में हमेशा अमिट हो जाने वाले विलक्षण शब्दों में 'कल्पना का अंत' इन्हीं परमाणु विध्वंसों की संभावनाओं के बारे में लिखा। 'कल्पना का अंत' के हर वाक्य और उसके हर शब्द डर, दुस्वप्न और आशंकाओं में डुबे हुए थे।

यही वह डर और दुस्वप्न था जिसे अमेरिका में दो दुश्मन बनाए जाते देशों और कौमों के एक लड़के और लड़की की डरी हुई आंखों ने देखा था।
दोनों ने एक दूसरे का हाथ और ज़ोरों से थाम लिया।
दोनों की आंखों में डरी हुई मनुष्यता का प्यार लगातार गहरा और ठोस होता जा रहा था।
दोनों ने धीरे से एक दूसरे से, जैसे एक दूसरे को भरोसा दिलाते हुए, साफ़ साफ़ कहा :
'We have really..truly..fallen in LOVE ! Forever....!'

और वहां बुद्ध धीरे से हंसे होंगे, जिसे दोनों ने ज़रूर सुना होगा।

फिर इसके एक साल बाद, इन्हीं ता्रीखों में शुरू किया गया 'कारगिल यु्द्ध'। संसार के युद्धों के इतिहास में सबसे उंचाइयों में लड़ा जाने वाला यह एक ऐसा युद्ध था, जिसमें सरहद के दोनों तरफ़ के लोग, जिन्होंने दो अलग-अलग देशों की फौज़ों की बर्दियां पहन रखी थीं, बहुत बड़ी संख्या में मारे गये। कहा जाता है कि १९६९ में जब एक ही विचारधारा का दम भरने वाले सोवियत रूस और चीन के बीच सीमा विवाद हुआ था, तो जैसा भय सारी एशियाई देशों के ऊपर मंडरा रहा था, कारगिल युद्ध के दौरान भी वह भय और आशंका पैदा हो गई थी। वजह यह कि उस समय के रूस और चीन की तरह इस समय पाकिस्तान और हिंदुस्तान, दोनों के पास भी परमाणु बम मौज़ूद थे। इसका इस्तेमाल कोई भी किसी के खिलाफ़ कभी भी कर सकता था।
यही वजह थी कि कारगिल की लड़ाई ज़्यादातर ज़मीनी रही और इसमें बहुत बड़ी तादाद में सैनिकों को जान गंवान पड़ी।
गांव-गांव, शहर-शहर 'शहीदों' के ताबूत पहुंच रहे थे और मरने वालों के पिताओं, विधवाओं, बच्चों को 'पेट्रोल पंप' और कभी कुछ और ईनाम दिया जा रहा था। अश्विनी चौधरी ने हरियाणा के एक ऐसे ही 'शहीद' के परिजनों की त्रासदी पर एक औसत लेकिन मार्मिक फिल्म 'धूप' बनाई थी।

तो यही वे तारीखें भी थीं, जो भले ही किसी राष्ट्र-राज्य के इतिहास में दर्ज़ न हों, लेकिन जिसकी कहानी अमितावा कुमार की सांस बांध लेने वाली किताब 'एक आतंकी का पति' (Husband of a Fanatic) में कही गयी है। एक ओर बेहद निजी ज़िंदगी की घटनाएं और दूसरी तरफ़ दक्षिणी एशिया के दो पड़ोसी देशों के बीच की हिंसा और घृणा की राजनीति के आर-पार यात्रा करता यह आख्यानात्मक वृत्तांत अपने आप में एक अपूर्व मानवीय दस्तावेज़ है। सत्ताकेंद्रित राजनीति के मनुष्यता-विरोधी चेहरे को सार्वजनिक रूप से विखंडित करता हुआ।

तो..आइये अब उस लड़की और उस लड़के की ओर लौटें, जिन्होंने एक साल पहले अपने-अपने देशों की सरहद पर परमाणु बमों के विस्फोटों के विनाश के खिलाफ़ सारी दुनिया के सामने अपने प्यार का इज़हार किया था।
वह उदास, सुंदर और डरी हुई लड़की का नाम था - मोना अहमद।
और उस चिंतित, सुंदर, प्रतिभाशाली लड़के का नाम था.....अमितावा कुमार।
वही, जो खुद यह किताब लिख रहा था।
मोना अगर पाकिस्तान के लाहौर या कराची या किसीऐसे दूसरे शहर से आयी थी तो अमितावा भी हिंदुस्तान के बिहार या झारखंड या दिल्ली या पटना जैसे किसी इलाके से वहां आये थे।
दोनों अपने-अपने देशों और कौमों के साधारण, आम इंसानों की भावनाओं और ज़िंदगियों के यथार्थ को समझते थे। दोनों उस सियासत को जानते थे, जिसकी जड़ें ही दो मानव समुदायों के बीच के संदेह, घृणा और हिंसक टकराहटों के बीच होती हैं।
इसीलिए जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ और संसार की दुर्गम ऊंचाइयों में, हड्डियों तक को जमा देने वाली बर्फ़ में सांप्रदायिक राष्ट्रवादों के युद्ध में हर रोज़ अनमोल इंसानी ज़िंदगियां ताबूतों में कैद होने लगीं या बर्फ़ में जमने लगीं, तो उन दोनों ने फिर एक प्रेस कांफ़्रेंस किया।
उस प्रेस कांफ़्रेंस में उन दो उदास प्यार करने वाले पक्षियों ने कहा : 'हम एक दूसरे से बेइंतेहा प्यार करते रहे हैं और हम आज एक दूसरे से शादी करने का फ़ैसला करते हैं।'

कुछ देर की चुप्पी के बाद उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ मे जोड़ा :'' और हमारा यह विवाह दो देशों के युद्ध के विरोध में है।''

उस दिन भी, मुझे पूरा यकीन है, बुद्ध मुस्कुराए होंगे। ..आह! ऐसा जीवन, जिसमें निजी और सामाजिक के बीच कोई दूरी नहीं। कोई फांक नहीं। Personal is Political....!

लेकिन कानून तो किसी भी विवाह को तभी स्वीकार करता है, जब उस पर किसी धर्म या मज़हब की मुहर लगी हो। इसीलिए निकाह के लिए जब लड़का और लड़की मौलवी के पास पहुंचे तो मौलवी ने लड़के से कहा -'निकाह के लिए तुम्हें मज़हब बदलना होगा।'
लड़के ने कहा:'' मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि प्यार से बड़ा कोई मज़हब या रिलीज़न नहीं होता।''
''तो तुम इस्लाम कुबूल करते हो? अपना ईमान इस पर लाते हो?''
''जी हां! मैं पूरी ईमानदा्री से कहता हूं कि मेरा ईमान हर उस मज़हब पर आता है जो लोगों के बीच मोहब्बत की सीख देता है। इस्लाम भी ऐसा ही मज़हब है।''
''तुम्हें अपना नाम बदलना पड़ेगा। ... तैयार हो?''
''जी हां!''
''कौन-सा नाम तुम अपने लिए पसंद करोगे?'' मौलवी ने मुस्कुराते हुए पूछा। उस लड़के और उस लड़की के प्यार को देख कर उसे खुद कुछ बहुत अच्छा-सा लग रहा था।
(अब आज जब मैं आपके लिए, यह लिख रहा हूं तो मुझे यह ठीक-ठीक याद नहीं है कि मेरे प्रिय लेखक और एक बेह्तरीन इंसान अमितावा कुमार ने अपने लिए कौन-सा नाम चुना क्योंकि यह किताब पढे़ हुए आज कई साल हो गये। चलिये मान लेते हैं कि उस लड़के ने कहा होगा -'सफ़दर !'
यह नाम मेरे दिमाग मे इसलिए आया कि मेरे दोस्त सफ़दर के दिल में भी दूसरों के लिए प्यार के सिवा कुछ नहीं था। और शायद इसी गुनाह की कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।)

.....तो उस दिन जब दक्षिण एशिया में दो पड़ोसी देशों के बीच युद्ध और हिंसा का विनाश सरहद पर लाशें बिछा रहा था, उन्हीं दो देशों के एक लड़के और लड़की के बीच निकाह हुआ।

मुझे पूरा विश्वास है, उस रोज़, आकाश में बुद्ध ही नहीं..सारे के सारे पैगंबर मुस्कुराए होंगे।

कारगिल युद्ध खत्म होने के बाद, हमेशा खेले जाने वाले घिसे-पिटे सियासी नाटक की तरह, दोनों देशों के शासकों ने फिर 'सदभावना' और 'शांति' का दौर शुरू किया। साम्राज्यवादी देशों के बहु-राष्ट्रीय हथियार विक्रेता कंपनियों के लिए युद्ध के बाद यह व्यापार और मुनाफे का चैप्टर शुरू हो रहा था। राजनीति और व्यापार दोनों के लिए युद्ध और शांति दोनों खपत और मुनाफ़े के लिए ज़रूरी होते हैं और वे अपनी मर्ज़ी से दोनों के पन्ने पारी-पारी पलटते रहते हैं।

जीटी करनाल रोड से दिल्ली से लाहौर जाने वाली 'सदभावना बस' चलाई गयी। इसमें पहले मुसाफ़िर वही सांप्रदायिक और हिंसक सियासी शतरंज के खिलाड़ी थे जिहोंने परमाणु बमों के धमाके किये थे और हज़ारों निर्दोषों को एक व्यर्थ के युद्ध में झोंक दिया था। अब नये दृश्य में वे एक-दूसरे को लड्डू-पेड़े खिलाते हुए, गले मिल रहे थे।
हर कोई सहमा हुआ यह सब देख रहा था।
बालीवुड, जो 'बार्डर' जैसी फ़िल्मों को बाक्स आफिस में हिट करा चुकी थी, अब 'वीरजारा' बनाने लगी थी। मीडिया और अखबार, जो अब तक युद्धोन्माद और हिंसक राष्ट्रवाद को हवा दे रहे थे, अब शांतिपाठ कर रहे थे।
यह राजनीति का 'मृत्युभोज' था। बेशुमार निर्दोष मनुष्यों के शवों के ऊपर गलीचा बिछाकर गज़ल और साझा कल्चर की महफिल। दोनों देशों की सरकारें अपने-अपने दरबारी लेखकों-बुद्धिजीवियों के डेलिगेशन एक-दूसरे के देशों में भेज रहीं थीं।

उस लड़के ने भी पाकिस्तान के दूतावास में अर्ज़ी दी:''मैं अपनी ससुराल जाना चाहता हूं।''
पाकिस्तान और अमेरिका, दोनों के लिए यह एक प्रिय लगने वाली आकांक्षा नहीं थी।
पाकिस्तानी डिप्लोमेटिक अफ़सरों ने कहा, वीज़ा के लिए आपको अपनी ससुराल से लोगों के निमंत्रण-पत्र पेश करने होंगे। तभी आपको इज़ाज़त दी जायेगी।
लड़की ने अपने मायके वालों को फोन किया कि 'ये वहां आना चाहते हैं। इनविटेशन लेटर्स मांग रहे हैं कौंसुलेट वाले।''
देखते ही देखते दर्ज़नों नहीं पचासों इनविटेशंस आ गये।
लड़के ने उन्हें पाकिस्तानी दूतावास के सामने रखा।
अफ़सर की पेशानी पर परेशानी और चिढ़ की लकीरें थीं। इसे कैसे रोकें। राष्ट्र-राज्य इस लड़के जैसे लोगों के लिए नहीं बनाए जाते। राष्ट्र-राज्य उसमें रहने-जीने वाले, एक दूसरे से प्यार और सहयोग करने वाले इंसानों की खातिर नहीं बनाये जाते।
राष्ट्र-राज्य तो राजनीतिकों, सरकारों, व्यापारियों, फौज़ों वगैरह के लिए हुआ करते हैं। मुश्किल मगर यह है कि अब इस लड़के को रोकें कैसे?
अफ़सर ने जवाब दिया :''हम इन डाक्युमेंट्स को अभी चेक करेंगे। बाद में आना।''
कुछ दिनों बाद, दी गयी तारीख़ और वक्त पर लड़का और लड़की फिर मौज़ूद थे।
अफ़सरों ने कहा :''हमने सारे इनविटेशन लेटर्स चेक किये हैं। इनमें से एक भी लेटर ऐसा नहीं है, जिसे तुम्हारे किसी ब्लड रिलेटिव (रक्त-संबंधी) ने लिखा हो। सब के सब तुम्हारे 'इनलाज़' (ससुराल वाले) हैं। तुम अपनी ससुराल से किसी ब्लड रिलेशन का पत्र लाकर सबमिट करो।''

लड़के की आंखों में वही हंसी थी, जो इस समय हर जागरूक और निर्दोष युवा की आंखों में झलकती है। हर उसकी आंखों में, जो दूसरों से प्यार करता हुआ हिंसा और तबाही के सारे खेल और सारी बिसातों की भयावह परिणतियों को जानता है।
लड़के का यानी मेरे प्रिय लेखक अमितावा का उत्तर था :'' देखिए, हम दोनों कौमों ने पिछली सदी से लेकर आज तक एक दूसरे का जितना खून (ब्लड) बहाया है, उसे देखते हुए हमसे ज़्यादा गहरा और पक्का 'ब्लड-रिलेशन' किसी का हो नहीं सकता।''
वे अफ़सर स्तब्ध थे।
उनके चेहरे सफ़ेद हो चुके थे। शायद इस जवाब की उम्मीद उन्हें नहीं थी।

बुद्ध ज़रूर हंसे होंगे, लड़के की इस बात पर।

इसके बाद लड़का अपनी ससुराल यानी पाकिस्तान गया। उसका वहां के युवाओं ने भरपूर स्वागत किया। विश्वविद्यालयों में उनको देखने और उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी।
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से, आम लोगों से सबसे उन्होंने बातचीत की।
वह लड़की भी अपनी ससुराल आयी। यानी हिंदुस्तान।
यहां पटना में जब दोनों के 'विवाह' के बाकी रीतियां पूरी की जा रहीं थीं, मैं उस दिन वहीं था। पुस्तक मेले में। एन.बी.टी. की तरफ़ से 'मीट दि आथर' कार्यक्रम में भाग लेने। तब तक मुझे पता नहीं था कि अमितावा और मोना दोनों उस दिन वहीं थे।
अमितावा ने भारत के भी तमाम स्कूली बच्चों से बात की। उनसे सवाल पूछे।
गुजरात में २००२ के सांप्रदायिक जन-संहार के बाद वहां जाकर घूमते रहे। सच यह है कि टी. आर. पी. के पीछे पागल कार्पोरेट मीडिया, सांप्रदायिक और भ्रष्ट राजनीति तथा हिंसा और मौत के सामान के व्यापारियों के सर्वव्यापी अभियान के बावज़ूद यहां रहने बसने वाले आम लोग और बच्चे...कोई भी हिंसा अब नहीं चाहता। कोई भी युद्ध और तबाही नहीं चाहता।

मेरा मन होता है कि इस किताब का हिंदी अनुवाद ही नहीं, उर्दू, बंगला समेत सारी भाषाओं में अनुवाद हो और इसे सस्ती दर पर सबको बांटा जाय। जैसा एक समीक्षक ने लिखा है कि 'दुश्मन की अवधारणा' (Idea of Enemy) पर इतनी गहरायी, तथ्यों, सर्वेक्षण और साहस के साथ लिखी गयी यह किताब सिर्फ़ दो देशों के सरहद के आर-पार की यात्रा की कहानी ही नहीं, यह हमारी अंतरात्मा के भीतर तक उतरती, सब कुछ को उलटती-पलटती, बेहद ईमानदार किताब है।
हिंदुत्ववादियों और कट्टरपंथी मुसलमानों को यह किताब उनकी साझा मानवीय विरासत की याद दिलाती है। इसे पढने के बाद अचानक याद आने लगता है कि सिंधु सभ्यता के वे मिथक और लोक गाथाओं के पात्र, जो हमारी साझी संस्कृति या तहज़ीब के हिस्सा थे, कैसे सियासत और सत्ताखोरों ने उन्हें छीन कर एक दूसरे के शत्रु-प्रतीकों में बदल डाला। ईसा की सातवीं सदी के पहले जब कहीं मुसल्मान जैसा कौम नहीं था या ईसा से ह़ज़ार साल पहले,पश्चिमी लोगों के आने के पहले तक जब कोई हिंदू कहीं नहीं होता था, हमारी लोक-गाथाएं तब भी थीं। राम से लेकर कृष्ण तक की, रामायण से लेकर महाभारत तक के पात्र तब भी थे। लेकिन वे ना तो हिंदू थे ना मुसलमान। वे तो सिंधु सभ्यता के लोगों की साझी संस्कृति की सम्मिलित मिथक-लोक आख्यानों के हिस्सा थे। राम पर सिर्फ़ कट्टर हिंदुत्ववादियों का अधिकार कैसे हो गया? उनके नाम पर सांप्रदायिक हिंसा और युद्ध और जनसंहार क्यों होने लगा? ये सवाल अनुत्तरित नहीं हो सकते।
इनका जवाब दिया जाना चाहिए। इसलिए कि हिंसा और राजनीति के इस विनाशकारी खेल की कीमत उन महान मिथकीय पात्रों को चुकानी पड़ती है।
राम जैसे करुणा और वंचना के मानवीय मिथक-नायक को देख कर अन्य समुदाय के बच्चे डर कर रोने लगते हैं।
और जब 'बुद्ध की मुस्कान' का नाम देकर परमाणु बमों का विस्फोट किया जाता है तो कांधार में, बामियान के पहाड़ों में उनका सिर मोर्टारों और मिसाइलों से तोड़ दिया जाता है।

काश अमितावा कुमार की यह किताब वे भी पढ़ते जो सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीति करते हैं।
खैर, आखिर में आप सबसे मैं फिर से क्षमा मांगता हूं कि अपना वायदा पूरा करने में मुझे इतने सारे दिन लग गये। अंत में यह भी जोड़ना चाहता हूं कि अब

अब 'लड़के' और उस 'लड़की' के परिवार में एक नन्हीं-सी बच्ची भी है। इला नाम है उसका।
काश एक ऐसा भविष्य हमारे जीते जी आये कि इला हंसे और उसकी निर्मल पवित्र हंसी में मनुष्यों के बीच खड़ी की गयीं वे सारी दीवारें ढहें, टूट बिखर जायें, जिनकी हिफ़ाजत के नाम पर हिंसा का व्यापार और उसकी सियासत होती है।
इला की एक ऐसी मुस्कान, जो सिंधु और गंगा-यमुना के जल को फिर से मीठा और पवित्र कर दे।
एक ऐसा भविष्य आये! ज़रूर आये!


इससे आगे

25 February 2010

चूल्हे भाड में जाय यह चाहत - चाह के हाथों किसी को सुख नहीं

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मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच .. उधर  हमको नींद सताती थी, और की सुनिये । अब तक जो पढ़ा सो यह था कि मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ के एक छींटा पानी का मिलना था कि छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड कर जैसे थे वैसे हो गए ।
कोताह यह कि पानी के छींटों के परताप से इस किस्से की रवानगी आगे बढ़ चलती है और यह कहानी हरकत में आती है, इस तरह कि.. " गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बडी आवभगत से अपने पास बैठाया और वही पानी घडा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मुंडवाते ही ओले पडे थे । राजा इंदर के लोगों ने जो पानी की छीटें वही ईश्वरोवाच पढ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खडे हुए; और जो अधमुए भाग बचे थो, सब सिमट आए ।"
सैय्यद ईँशा अल्लाह खाँ साहब इस करतब को बयान करने के बाद जो लिखते हैं, वह सुनो..

राजा इंदर और महेंदर गिर कुँवर उदैभान और राजा सूरजभान और रानी लक्ष्मीबास को लेकर एक उड न-खटोलो पर बैठकर बडी धूमधाम से उनको उनके राज पर बिठाकर ब्याह का ठाट करने लगे । पसेरियन हीरे-मोती उन सब पर से निछावर हुए । राजा सूरजभान और कुँवर उदैभान और रानी लछमीबास चितचाही असीस पाकर फूली न समाई और अपने सो राज को कह दिया-जेवर भोरे के मुंह खोल दो । जिस जिस को जो जा उकत सूझे, बोल दो । आज के दिन का सा कौन सा दिन होगा । हमारी आँखों की पुतलियों से जिससे चैन हैं, उस लाडले इकलौते का ब्याह और हम तीनों का हिरनों के रूप से निकलकर फिर राज पर बैठना । पहले तो यह चाहिए जिन जिन की बेटियाँ बिन ब्याहियाँ हों, उन सब को उतना कर दो जो अपनी जिस चाव चीज से चाहें; अपनी गुडियाँ सँवार के उठावें; और तब तक जीती रहें, सब की सब हमारे यहाँ से खाया पकाया रींधा करें । और सब राज भर की बेटियाँ सदा सुहागनें बनी रहें और सूहे रातें छुट कभी कोई कुछ न पहना करें और सोने रूपे के केवाड गंगाजमुनी सब घरों में लग जाएँ और सब कोठों के माथे पर केसर और चंदन के टीके लगे हों । और जितने पहाड हमारे देश में हों, उतने ही पहाड सोने रूपे के आमने सामने खडे हो जाएँ और सब डाँगों की चोटियाँ मोतियों की माँग ताँगे भर जाएँ; और फूलों के गहने और बँधनवार से सब झाड पहाड लदे फँदे रहें; और इस राज से लगा उस राज तक अधर में छत सी बाँध दो । और चप्पा चप्पा कहीं ऐसा न रहें जहाँ भीड भडक्का धूम धडक्का न हो जाय । फूल बहुत सारे बहा दो जो नदियाँ जैसे सचमुच फूल की बहियाँ हैं यह समझा जाय । और यह डौल कर दो, जिधर से दुल्हा को ब्याहने चढे सब लाड ली और हीरे पन्ने पोखराज की उमड में इधर और उधर कबैल की टट्टियाँ बन जायँ और क्यारियाँ  जिनके बीचो बीच से हो निकलें । और कोई डाँग और पहाडी तली का चढाव उतार ऐसा दिखाई न दे जिसकी गोद पंखुरियों से भरी हुई न हों ।

इस धूमधाम के साथ कुँवर उदैभान सेहरा बाँधे दूल्हन के घर तक आ पहुँचा और जो रीतें उनके घराने में चली आई थीं, होने लगियाँ । मदनबान रानी केतकी से ठठोली करके बोली- लीजिए, अब सुख समेटिए, भर भर झोली । सिर निहुराए, क्या बैठी हो, आओ न टुक हम तुम मिल के झरोखों से उन्हें झाँकें । रानी केतकी ने कहा- न री, ऐसी नीच बातें न कर । हमें ऐसी क्या पडी जो इस घडी ऐसी झेल कर रेल पेल ऐसी उठें और तेल फुलेल भरी हुई उनके झाँकने को जा खडी हों । बदनबान उसकी इस रूखाई को उड़नझाई की बातों में डालकर बोली-  बोलचाल मदनबान की अपनी बोली के दोनों में-

यों तो देखो वाछडे जी वाछडे जी वाछडे । हम से जो आने लगी हैं आप यों मुहरे कडे ॥
छान मारे बन के बन थे आपने जिनके लिये । वह हिरन जीवन के मद में हैं बने दूल्हा खडे ॥
तुम न जाओ देखने को जो उन्हें क्या बात है । ले चलेंगी आपको हम हैं इसी धुन पर अडे ।
है कहावत जी को भावै और यों मुडिया हिले । झांकने के ध्यान में उनके हैं सब छोटे बडे ।।
साँस ठंडी भरके रानी केतकी बोली कि सच । सब तो अच्छा कुछ हुआ पर अब बखेडे में पडे ॥

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वारी फेरी होना मदनबान का रानी केतकी पर और उसकी बास सूँघना और उनींदे पन से ऊंघना उस घडी मदनबान को रानी केतकी का बादले का जूडा और भीना भीनापन और अँखडियों का लजाना और बिखरा बिखरा जाना भला लग गया, तो रानी केतकी की बास सूँघने लगी और अपनी आँखों को ऐसा कर लिया जैसे कोई ऊँघने लगता है । सिर से लगा पाँव तक वारी फेरी होके तलवे सुहलाने लगी । तब रानी केतकी झट एक धीमी सी सिसकी लचके के साथ ले ऊठी : मदनबान बोली-मेरे हाथ के टहोके से, वही पांव का छाला दुख गया होगा जो हिरनों की ढूँढने में पड गया था। इसी दु:ख की चुटकी से रानी केतकी ने मसोस कर कहा-काटा - अडा तो अडा, छाला पडा तो पडा, पर निगोडी तू क्यों मेरी पनछाला हुई ।

सराहना रानी केतकी के जोबन का केतकी का भला लगना लिखने पढने से बाहर है । वह दोनों भैवों का खिंचावट और पुतलियों में लाज की समावट और नुकीली पलकों की रूँ धावट हँसी की लगावट और दंतडियों में मिस्सी की ऊदाहट और इतनी सी बात पर रूकावट है । नाक और त्योरी का चढा लेना, सहेलियों को गालियाँ देना और चल निकलना और हिरनों के रूप में करछालें मारकर परे उछलना कुछ कहने में नहीं आता । सराहना कुँवर जी के जोबन का कुँवर उदैभान के अच्छेपन का कुछ हाल लिखना किससे हो सके । हाय रे उनके उभार के दिनों का सुहानापन, चाल ढाल का अच्छन बच्छन, उठती हुई कोंपल की काली फबन और मुखडे का गदराया हुआ जोबन जैसे बडे तड के धुंधले के हरे भरे पहाडों की गोद से सूरज की किरनें निकल आती हैं । यही रूप था । उनकी भींगी मसों से रस टपका पडता था । अपनी परछाँई देखकर अकडता जहाँ जहाँ छाँव थी, उसका डौल ठीक ठीक उनके पाँव तले जैसे धूप थी ।

दूल्हा का सिंहासन पर बैठना दूल्हा उदैभान सिंहासन पर बैठा और इधर उधर राजा इंदर और जोगी महेंदर गिर जम गए और दूल्हा का बाप अपने बेटे के पीछे माला लिये कुछ गुनगुनाने लगा । और नाच लगा होने और अधर में जो उड़न खटोले राजा इंदर के अखाडे के थे । सब उसी रूप से छत बाँधे थिरका किए । दोनों महारानियाँ समधिन बन के आपस में मिलियाँ चलियाँ और देखने दाखने को कोठों पर चन्दन के किवाडों के आड तले आ बैठियाँ । सर्वाग संगीत भँड ताल रहस हँसी होने लगी । जितनी राग रागिनियाँ थीं, ईमन कल्यान, सुध कल्यान झिंझोटी, कन्हाडा, खम्माच, सोहनी, परज, बिहाग, सोरठ, कालंगडा, भैरवी, गीत, ललित भैरी रूप पकडे हुए सचमुच के जैसे गाने वाले होते हैं, उसी रूप में अपने अपने समय पर गाने लगे और गाने लगियाँ । उस नाच का जो ताव भाव रचावट के साथ हो, किसका मुंह जो कह सके । जितने महाराजा जगतपरकास के सुखचैन के घर थे, माधो बिलास, रसधाम कृष्ण निवास, मच्छी भवन, चंद भवन सबके सब लप्पे लपेटे और सच्ची मोतियों की झालरें अपनी अपनी गाँठ में समेटे हुए एक भेस के साथ मतवालों के बैठनेवालों के मुँह चूम रहे थे ।

पर कुंवर जी का रूप क्या कहूं । कुछ कहने में नहीं आता। न खाना, न पीना, न मग चलना, न किसी से कुछ कहना, न सुनना । जिस स्थान में थे उसी में गुथे रहना और घडी-घडी कुछ सोच सोच कर सिर धुनना । होते-होते लोगों में इस बात का चरचा फैल गई । किसी किसी ने महाराज और महारानी से कहा - कुछ दाल में काला है । वह कुंवर बुरे तेवर और बेडौल आंखें दिखाई देती हैं । घर से बाहर पांव नहीं धरना । घरवालियां जो किसी डौल से बहलातियां हैं, तो और कुछ नहीं करना, ठंडी ठंडी सांसें भरता है । और बहुत किसी ने छेडा तो छपरखट पर जाके अपना मुंह लपेट के आठ आठ आंसू पडा रोता है । यह सुनते ही कुंवर उदैभान के माँ-बाप दोनों दौड आए । गले लगाया, मुंह चूम पांच पर बेटे के गिर पडे हाथ जोडे और कहा -

जो अपने जी की बात है सो कहते क्यों नहीं ? क्या दुखडा है जो पडे-पडे कहराते हो ? राज-पाट जिसको चाहो दे डालो । कहो तो क्या चाहते हो ? तुम्हारा जी क्यों नहीं लगता ? भला वह क्या है जो नहीं हो सकता ? मुंह से बोलो जी को खोलो । जो कुछ कहने से सोच करते हों, अभी लिख भेजो । जो कुछ लिखोगे, ज्यों की त्यों करने में आएगी । जो तुम कहो कुंए में गिर पडो, तो हम दोनों अभी गिर पडते हैं । कहो - सिर काट डालो, तो सिर अपने अभी काट डालते हैं । कुंवर उदैभान, जो बोलते ही न थे, लिख भेजने का आसरा पाकर इतना बोले - अच्छा आप सिधारिए, मैं लिख भेजता हूं । पर मेरे उस लिखे को मेरे मुंह पर किसी ढब से न लाना । इसीलिए मैं मारे लाज के मुखपाट होके पडा था और आपसे कुछ न कहना था । यह सुनकर दोनों महाराज और महारानी अपने स्थान को सिधारे । तब कुंवर ने यह लिख भेजा - अब जो मेरा जी होंठों पर आ गया और किसी डौल न रहा गया और आपने मुझे सौ-सौ रूप से खोल और बहुत सा टटोला, तब तो लाज छोड के हाथ जोड के मुंह फाड के घिघिया के यह लिखता हूं-

चाह के हाथों किसी को सुख नहीं । है भला वह कौन जिसको दुख नहीं ॥ उस दिन जो मैं हरियाली देखने को गया था, एक हिरनी मेरे सामने कनौतियां उठाए आ गई । उसके पीछे मैंने घोडा बगछुट फेंका । जब तक उजाला रहा, उसकी धुन में बहका किया । जब सूरज डूबा मेरा जी बहुत ऊबा । सुहानी सी अमराइयां ताड के मैं उनमें गया, तो उन अमराइयों का पत्ता-पत्त्ता मेरे जी का गाहक हुआ । वहां का यह सौहिला है । कुछ रंडियां झूला डाले झूल रही थीं । उनकी सिरधरी कोई रानी केतकी महाराज जगतपरकास की बेटी हैं । उन्होंने यह अंगूठी अपनी मुझे दी और मेरी अंगूठी उन्होंने ले ली और लिखौट भी लिख दी । सो यह अंगूठी लिखौट समेत मेरे लिखे हुए के साथ पहुंचती है -

अब आप पढ लीजिए । जिसमें बेटे का जी रह जाय, सो कीजिए । महाराज और महारानी ने अपने बेटे के लिखे हुए पर सोने के पानी से यों लिखा - हम दोनों ने इस अंगूठी और लिखौट को अपनी आंखों से मला । अब तुम इतने कुछ कुढो पचो मत । जो रानी केतकी के मां बाप तुम्हारी बात मानते हैं, तो हमारे समधी और समधिन हैं । दोनों राज एक हो जाएंगे । और जो कुछ नांह - नूंह ठहरेगी तो जिस डौल से बन आवेगा, ढाल तलवार के बल तुम्हारी दुल्हन हम तुमसे मिला देंगे । आज से उदास मत रहा करो । खेलो, कूदो, बोलो चालो, आनंदें करो । अच्छी घडी- शुभ मुहूरत सोच के तुम्हारी ससुराल में किसी ब्राह्मन को भेजते हैं; जो बात चीत चाही ठीक कर लावे और शुभ घडी शुभ मुहूरत देख के रानी केतकी के मां-बाप के पास भेजा । ब्राह्मन जो शुभ मुहूरत देखकर हडबडी से गया था, उस पर बुरी घडी पडी । सुनते ही रानी केतकी के मां-बाप ने कहा - हमारे उनके नाता नहीं होने का ।

भला उनके नाता होने से मेरा क्या लेना देना - सो भाई अपने कौतूहल को अभी लगाम लगावो । ,उधर केतकी की कहानी खतम होने का कोई डौल नहीं दिखता, और इधर मशीन की लिखौट करने से मेरी ऊँगलियाँ भी थकी जाती हैं । अगली बारी तक.. अपने हिय में धीर रखो, बाकी का किस्सा जल्द पूरा हुआ चाहता है ।

इससे आगे

22 February 2010

गोरख जागा, मुंछदर जागा और मुंछदर भागा

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यह किस्सा गोरख जागा, मुंछदर जागा  और  मुंछदर भागा तक पहुँचाया, और  धीरे धीरे ऎसे अड़चन आन पड़ी और ऎसी बान बनी  कि हिरदय में एक छिन को लगता रानी केतकी की पूरी कहानी मेरे पन्नों पर कभी  उतर कर न आ पावेगी । जिस घडी इसे पूरी करने की ठानता, एक न एक मुसीबतें आ खड़ी होती,  मेरे सभी सोचे पर धूल मट्टी डाल कर सँग उड़ा ले जाती । गिनती के मेरे कदरदान मन में यह बैन करते कि मुआ मुँछदर भागा तो भागा अपने साथ साथ बाकी बचे किस्से को भी उड़ा ले गया । लाख लाख किरपा गुरु महराज की अब दुबारा से इस अधूरे किस्सा-बयानी को अदा करने का डौल लग रहा है । मत्था टेक कर दोहाई भैरोनाथ की अब बाकी का यह काम अँजाम होकर मुझे सूरज की गरमी में चाँद की सी ठँडक पहुँचाये । -अरज़मँद डा.अमर कुमार              ..

(  चाल हिन्दवी की - बयान माफ़ीनामा गैरहाज़िरी का  और तर्ज़ इँशा अल्ला खाँ  का )

rani-ketki-madhubani  तो, मित्रों भला अधूरी क्यों रह जाये यह’ रानी केतकी की कहानी ? अब आगे बढ़ते हैं

एक आंख की झपक में ( मुँछदर ) वहां आ पहुंचता है जहां दोनों महाराजों में लडाई हो रही थी । पहले तो एक काली आंधी आई; फिर ओले बरसे; फिर टिड्डी आई । किसी को अपनी सुध न रही । राजा सूरजभान के जितने हाथी घोडे और जितने लोग और भीडभाड थी, कुछ  न  समझा  कि  क्या  किधर  गई  और  उन्हें  कौन  उठा  ले  गया । राजा जगत परकास के लोगों पर और रानी केतकी के लोगों पर क्योडे की बूंदों की नन्हीं-नन्हीं फुहार सी पडने लगी । जब यह सब कुछ हो चुका, तो गुरुजी ने अतीतियों से कहा - उदैभान, सूरजभान, लछमीबास इन तीनों को हिरनी हिरन बना के किसी बन में छोड दो; और जो उनके साथी हों, उन सभों को तोड फोड दो । जैसा गुरुजी ने कहा, झटपट वही किया । विपत का मारा कुंवर उदैभान और उसका बाप वह राजा सूरजभान और उनकी मां लछमीबास हिरन हिरनी बन गए । हरी घास कई बरस तक चरते रहे; और उस भीड भाड का तो कुछ थल बेडा न मिला, किधर गए और कहां थे बस यहां की यहीं रहने दो ।

फिर सुनो । अब रानी केतकी के बाप महाराजा जगतपरकास की सुनिए । उनके घर का घर गुरु जी के पांव पर गिरा और सबने सिर झुकाकर कहा - महाराज, यह आपने बडा काम किया । हम सबको रख लिया । जो आप न पहुंचते तो क्या रहा था । सबने मर मिटने की ठान ली थी । महाराज ने कहा - भभूत तो क्या, मुझे अपना जी भी उससे प्यारा नहीं । मुझे उसके एक पहर के बहल जाने पर एक जी तो क्या जो  करोर  ( करोड़ ) जी हों तो दे डालें । रानी केतकी को डिबिया में से थोडा सा भभूत दिया । कई दिन तलक भी आंख मिचौवल अपने माँ-बाप के सामने सहेलियों के साथ खेलती सबको हँसाती रही, जो सौ सौ थाल मोतियों के निछावर हुआ किए, क्या कहूँ, एक चुहल थी जो कहिए तो करोडों पोथियों में ज्यों की त्यों न आ सके । रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदन बान का साथ देने से नहीं करना । एक रात रानी केतकी उसी ध्यान में मदनबान से यों बोल उठी-अब मैं निगोडी लाज से कुट करती हूँ, तू मेरा साथ दे । मदनबान ने कहा-क्यों कर ? रानी केतकी ने वह भभूत का लेना उसे बताया और यह सुनाया यह सब आँख-मिचौवल के झाई झप्पे मैंने इसी दिन के लिये कर रखे थे । मदनबान बोली-मेरा कलेजा थरथराने लगा । अरी यह माना जो तुम अपनी आँखों में उस भभूत का अंजन कर लोगी और मेरे भी लगा दोगी तो हमें तुम्हें कोई न देखेगा । और हम तुम सबको देखेंगी । पर ऐसी हम कहाँ जी चली हैं । जो बिन साथ, जोबन लिए, बन-बन में पडी भटका करें और हिरनों की सींगों पर दोनों हाथ डालकर लटका करें, और जिसके लिए यह सब कुछ है, सो वह कहाँ ? और होय तो क्या जाने जो यह रानी केतकी है और यह मदनबान निगोडी नोची खसोटी उजडी उनकी सहेली है । चूल्हे और भाड में जाय यह चाहत जिसके लिए आपकी माँ-बाप को राज-पाट सुख नींद लाज छोड कर नदियों के कछारों में फिरना पडे, सो भी बेडौल । जो वह अपने रूप में होते तो भला थोडा बहुत आसरा था । ना जी यह तो हमसे न हो सकेगा ।

जो महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता का हम जान-बूझकर घर उजाडें और इनकी जो इकलौती लाडली बेटी है, उसको भगा ले जायें और जहाँ तहाँ उसे भटकावें और बनासपत्ति खिलावें और अपने घोडें को हिलावें । जब तुम्हारे और उसके माँ बाप में लडाई हो रही थी और उनने उस मालिन के हाथ तुम्हें लिख भेजा था जो मुझे अपने पास बुला लो, महाराजों को आपस में लडने दो, जो होनी हो सो हो; हम तुम मिलके किसी देश को निकल चलें; उस दिन समझीं । तब तो वह ताव भाव दिखाया । अब जो वह कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप तीनों जी हिरनी हिरन बन गए। क्या जाने किधर होंगे । उनके ध्यान पर इतनी कर बैठिए जो किसी ने तुम्हारे घराने में न की, अच्छी नहीं । इस बात पर पानी डाल दो; नहीं तो बहुत पछताओगी और अपना किया पाओगी । मुझसे कुछ न हो सकेगा । तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती, तो मेरे मुँह से जीते जी न निकलता । पर यह बात मेरे पेट में नहीं पच सकती । तुम अभी अल्हड हो । तुमने अभी कुछ देखा नहीं । जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूँगी तो तुम्हारे बाप से कहकर यह भभूत जो बह गया निगोडा भूत मुछंदर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूँगी । रानी केतकी ने यह रूखाइयाँ मदनबान की सुन हँ सकर टाल दिया और कहा-जिसका जी हाथ में न हो, उसे ऐसी लाखों सूझती है; पर कहने और करने में बहुत सा फेर है । भला यह कोई अँधेर है जो माँ बाप, रावपाट, लाज छोड कर हिरन के पीछे दौडती करछालें मारती फिरूँ । पर अरी ते तो बडी बावली चिडिया है जो यह बात सच जानी और मुझसे लडने लगी । रानी केतकी का भभूत लगाकर बाहर निकल जाना और सब छोटे बडों का तिलमिलाना दस पन्द्रह दिन पीछे एक दिन रानी केतकी बिन कहे मदनबान के वह भभूत आँखों में लगा के घर से बाहर निकल गई । कुछ  कहने  में  आता  नहीं, जो  मां-बाप  पर  हुई । सबने यह बात ठहराई, गुरूजी ने कुछ समझकर रानी केतकी को अपने पास बुला लिया होगा ।

महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता राजपाट उस वियोग में छोड छाड के पहाड की चोटी पर जा बैठे और किसी को अपने आँखों में से राज थामने को छोड गए । बहुत दिनों पीछे एक दिन महारानी ने महाराज जगतपरकास से कहा-रानी केतकी का कुछ भेद जानती होगी तो मदनबान जानती होगी । उसे बुलाकर तो पूँछो । महाराज ने उसे बुलाकर पूछा तो मदनबान ने सब बातें खोलियाँ । रानी केतकी के माँ बाप ने कहा-अरी मदनबान, जो तू भी उसके साथ होती तो हमारा जी भरता । अब तो वह तुझे ले जाये तो कुछ हचर पचर न कीजियो, उसको साथ ही लीजियो । जितना भभूत है, तू अपने पास रख । हम कहाँ इस राख को चूल्हें में डालेंगे । गुरूजी ने तो दोनों राज का खोज खोया-कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप दोनों अलग हो रहे । जगतपरकास और कामलता को यों तलपट किया । भभूत न होत तो ये बातें काहे को सामने आती । मदनबान भी उनके ढूँढने को निकली । अंजन लगाए हुए रानी केतकी रानी केतकी कहती हुई पडी फिरती थी । फुनगे से लगा जड तलक जितने झाड झंखाडों में पत्ते और पत्ती बँधी थीं, उनपर रूपहरी सुनहरी डाँक गोंद लगाकर चिपका दिया और सबों को कह दिया जो सही पगडी और बागे बिन कोई किसी डौल किसी रूप से फिर चले नहीं । और जितने गवैये, बजवैए, भांड-भगतिए रहस धारी और संगीत पर नाचने वाले थे, सबको कह दिया जिस जिस गाँव में जहाँ हों अपनी अपनी ठिकानों से निकलकर अच्छे-अच्छे बिछौने बिछाकर गाते-नाचते घूम मचाते कूदते रहा करें । ढूँढना गोसाई महेंदर गिर का कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप को, न पाना और बहुत तलमलाना यहाँ की बात और चुहलें जो कुछ है, सो यहीं रहने दो ।

अब आगे यह सुनो। जोगी महेंदर और उसके 90 लाख जतियों ने सारे बन के बन छान मारे, पर कहीं कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप का ठिकाना न लगा । तब उन्होंने राजा इंदर को चिट्ठी लिख भेजी । उस चिट्ठी में यह लिखा हुआ था-इन तीनों जनों को हिरनी हिरन कर डाला था । अब उनको ढूँढता फिरता हूँ । कहीं नहीं मिलते और मेरी जितनी सकत थी, अपनी सी बहुत कर चुका हूं । अब मेरे मुंह से निकला कुँवर उदैभान मेरा बेटा मैं उसका बाप और ससुराल में सब ब्याह का ठाट हो रहा है । अब मुझपर विपत्ति गाढी पडी जो तुमसे हो सके, करो । राजा इंदर चिट्ठी का देखते ही गुरू महेंदर को देखने को सब इंद्रासन समेट कर आ पहुँचे और कहा-जैसा आपका बेटा वैसा मेरा बेटा । आपके साथ मैं सारे इंद्रलोक को समेटकर कुँवर उदैभान को ब्याहने चढूँगा । गोसाई महेंदर गिर ने राजा इंद से कहा-हमारी आपकी एक ही बात है, पर कुछ ऐसा सुझाइए जिससे कुँवर उदैभान हाथ आ जावे । राजा इंदर ने कहा-जितने गवैए और गायनें हैं, उन सबको साथ लेकर हम और आप सारे बनों में फिरा करें। कहीं न कहीं ठिकाना लग जाएगा । गुरू ने कहा-अच्छा । हिरन हिरनी का खेल बिगडना और कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप का नए सिरे से रूप पकड ना एक रात राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर निखरी हुई चाँदनी में बैठे राग सुन रहे थे, करोडों हिरन राग के ध्यान में चौकडी भूल आस पास सर झुकाए खडे थे । इसी में राजा इंदर ने कहा-इन सब हिरनों पर पढ के मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ के एक छींटा पानी का दो । क्या जाने वह पानी कैसा था ।  छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड कर जैसे थे वैसे हो गए । गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बडी आवभगत से अपने पास बैठाया और वही पानी घडा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मुंडवाते ही ओले पडे थे । राजा इंदर के लोगों ने जो पानी की छीटें वही ईश्वरोवाच पढ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खडे हुए; और जो अधमुए भाग बचे थो, सब सिमट आए ।

देखता हूँ कि यह किस्सा लम्बा होता जाता है, ये बात उनसे कहो जिनने इस किस्से को बयान किया । कोई कोई का समय दिन का होगा तो वह रात को पढ़ेगा और किसी की रात बीतती होवेगी तो वह दिन को भी पढ़ लेगा । पर अब  इसको आपके सामने रखने में मेरी रात गहराती जाती है, कुछ नींद भी आती है । सो आज यहीं रहने दो, बाकी अगली बार

इससे आगे

4 February 2010

जोशिम ओर फुग्गो की बिरादरी

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सोचता   हूँ  कविता को परिभाषा  कितनी कठिन होगी ...  ...नियम हिज्जे के कानून ख्याल   को  कैसे   बाँध सकते  है  .....अक्सर जब ख्यालो  की रवानगी रुक  जाती है तो कंप्यूटर के दरवाजे खटखटाता हूँ ...लोगो को मुश्किलें होती होगी पर मुझे अक्सर मन चाहा मिल जाता है....जोशिम ऐसे ही एक खयालो के  जंगल  में घूमते आवारा बंजारे से है ...जिनके झोले में ढेरो जादुई फलसफे है ....आप उन्हें जितनी बार पढेगे नया सा कुछ मिलेगा ....कोर्स की किताब जैसा .......


किताब-हिसाब !

याने अफसाना नंबर दो ; उर्फ़ जहाज का पंछी; उर्फ़ घुमक्कड़नामा - एक]

क्या किया? क्या ना किया?, किस भीड़ से कथनी निकाली
क्यों थमे? कब चल पड़े? बहते बसर, सैलाब से अटकल मिलाली
कुछ इस तरह बस्तों ने शब्दों से वफ़ा ली

इतने इलाके घूम-चक्कर
बैठ घर दम फूलता
प्रतिरोध का ऊबा लड़कपन
पोस्टरों सा झूलता

हाँ दबदबा दब सा गया
जब लीक में बूड़े महल
पर शोर डूबे हैं नहीं
तैयार हैं, जब हो पहल

बेढब सफ़ों में मिर्च डाली, हो सका जितना नयी कोशिश निकाली
इंतजारों में खलल की फिक्र फेंकी, चुहल में कदमों से दो मंजिल जुड़ाली
हाँ इस तरह ......

यारों की भी, थी सूरतें,
ईमारतें रहमो करम
पर भागते कांटे रहे
भरते भरे बोरों शरम

कुछ भरम छूटे हाथ रूठे
किस्मतें घुलती रहीं
आवारगी आंखों की जानिब
उम्र संग ढलती रहीं

जिस आँख से चकमक मिले, उनकी पकड़ धक्-धक् सम्हाली,
कुछ मौन से, कुछ फोन से, बतझड़ भरे, रहबर मिली होली-दिवाली
हाँ इस तरह ......

सब खोह में मौसम न थे ,
कुछ काम भटके जाप थे
ताने सुने बाने बुने
हिस्सों में बंट कुछ शाप थे

कुछ रंग कुछ जोबन करा
कुछ झाड़ डैने छुप धरा
छौंके हुए अफ़सोस ने
कायम सा कुछ रोगन भरा

हिम्मत भी जैसी जस मिली, वो हौसलों में नींव डाली
ताली-दे-ताली पैर पटके, ढोल पीटे, हिनहिना सीटी बजा ली
हाँ इस तरह ......


ओर यहाँ वे किसी नियम से बंधे नहीं है ......अपनी रवानगी में अपने स्टाइल में ......अपने बिंदास अंदाज में ..खास तौर में जिस तरीके से वे कुछ  शब्दों का इस्तेमाल करते है ......जैसे कविता के नीचे लिखे शब्द........

कोट पीस दफ्तरी
उर्फ़ नौकरी की छनी खीज - - दोस्तों के शब्दों में - नग़्मा- ए- ग़म-ए-रोज़गार ]

कमख़्वाब नींद, कमनज़र ख़्वाब, डर मुंह्जबानी
ऊबे निश्वास, भटके विश्वास, उफ़ किस्से-कहानी

सुबह होड़-दौड़, शाम आग-भाग, कौतुकी खट राग,
मृगया मशक्कत, दीवानी कसरत, धौंस पहलवानी

कूद-कूद ढाई घर, बैठ सवा तीन, बिसात रंगीन
मग़ज़ घोर शोर, रीढ़ कमज़ोर, गुज़र-नौजवानी

फा़ईल खींच-खांच, नोटशीट तान, फ़र्शी गुन गान
रग-रग पे खून, खालिस नून-चून, रंग साफ़-पानी

नमश्कार-पुरश्कार, आदाब-अस्सलाम, सादर-परनाम
ठस आलमपनाह, हुकुम बादशाह, चिड़ी की रानी


ओर ये मेरी फेवरेट है ....जाने क्यों मुझे बेहद पसंद है .....जाने क्यों.........

फुग्गो की बिरादरी

क्या अभी भी यार तुम, शामें उड़ाते हो ?

चौंकते हो रात में
परछाईयों को बूझते हो,
पलट कम्बल मुंह उलट
लम्बाईयों में ऊंघते हो,
दिन सुने किस्से कहानी
नित अकेले सूंघते हो,
और फ़िर तख्ता पलट कर
चोर मन में गूंधते हो

क्या गुल्लकों में डर डरे नीदें जगाते हो ?
क्या अभी भी ....

तुम, तुम के आने से
अभी कुप्प फूलते हो क्या,
तभी तो सज संवर पुर जोर
मिस्टर कूदते हो क्या,
फुदक कर बात, बातों में
शरम से सूजते हो क्या,
और फ़िर तंज़ तानों से
तमक कर रूठते हो क्या,

क्या हक्लकाकर, मिचमिचा आँखें बनाते हो ?
क्या अभी भी .....

चिरोंजी छीलते हो
टेसुओं से रंग करते हो,
दबा कर पत्तियों को
तितलियों को तंग करते हो,
फकत झकलेट मौकों में
जबर की जंग करते हो,
बचा जो कुछ भी करते हो
सबर के संग करते हो,

तमातम फूँक कर सेमल के लब, फाहे बनाते हो ।
....
कहो न यार तुम इस दम तलक, कंचे लुकाते हो ।
....
कहो तो यार उन सीपों से तुम, कैरी छिलाते हो ।
....
फिर कहो अनकही सांसों से तुम, फुग्गे फुलाते हो ।

कहो ....


[प्यादे को पहलवान के .. आस पास ... बनने में अभी बहुत .. बहुत .. बहुत .. वक़्त है - (लेकिन लिखता कौन कमबख्त है सूरमा बनने के लिए) - उम्मीद से ज्यादा अपेक्षाओं( http://tarang-yunus.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html )का तहेदिल ... ]
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13 January 2010

मैं...एक बच्चे को प्यार कर रही थी

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सबद एक ऐसी लाइब्रेरी है जहाँ मनपसंद किताबो के कुछ बेहतरीन पन्ने मिल सकते है ...आज उसी लाइब्रेरी का एक पन्ना खोला है  ...

इस्मत चुगताई.......

मैं...एक बच्चे को प्यार कर रही थी

वालिद काफ़ी
रौशनख़याल थे. बहुत-से हिंदू खानदानों से मेलजोल था, यानी एक ख़ास तबके के हिंदू-मुसलमान निहायत सलीके से घुले-मिले रहते थे. एक-दूसरे के जज़्बात का ख़याल रखते. हम काफ़ी छोटे थे जब ही एहसास होने लगा था कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे से कुछ न कुछ मुख्तलिफ़ ज़रूर हैं. ज़बानी भाईचारे के प्रचार के साथ-साथ एक तरह की एहतियात का एहसास होता था.

अगर कोई हिंदू आए तो गोश्त-वोश्त का नाम न लिया जाए, साथ बैठकर मेज़ पर खाते वक्त भी ख्याल रखा जाए कि उनकी कोई चीज़ न छू जाए. सारा खाना दूसरे नौकर लगायें, उनका खाना पड़ोस का महाराज लगाये. बर्तन भी वहीं से माँगा दिए जायें. अजब घुटन सी तारी हो जाती थी. बेहद ऊंची-ऊंची रौशनख़याली की बातें हो रही हैं. एक दूसरे की मुहब्बत और जाँनिसारी के किस्से दुहराए जा रहे हैं. अंग्रेजों को मुजरिम ठहराया जा रहा है. साथ-साथ सब बुजुर्ग लरज़ रहे हैं कि कहीं बच्चे छूटे बैल हैं, कोई ऐसी हरकत न कर बैठें कि धरम भ्रष्ट हो जाए.

'' क्या हिंदू आ रहे हैं ?'' पाबंदियां लगते देखकर हमलोग बोर होकर पूछते.
''ख़बरदार! चाचाजी और चाचीजी आ रहे हैं. बद्तमीज़ी की तो खाल खींचकर भूसा भर दिया जाएगा.''

और हम फ़ौरन समझ जाते कि चचाजान और चचिजान नहीं आ रहे हैं. जब वो आते हैं तो सीख़कबाब और मुर्ग़-मुसल्लम पकता है, लौकी का रायता और दही-बड़े नहीं बनते.ये पकने और बनने का फर्क भी बड़ा दिलचस्प है.

हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे. उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी. एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी लाज़मी नहीं समझी जाती. सूशी हमारे यहाँ खाना भी खा लेती थी. फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूँकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती, इसलिए उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके बड़ा इत्मीनान होता था. हालाँकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था.

वैसे दिन भर एक दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बकरीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी. बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते. कई दिन तक गोश्त बंटता रहता. उन दिनों हमारे घर से लालाजी से नाता टूट जाता. उनके यहाँ भी जब कोई त्योहार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता.

लालाजी के यहाँ बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था. जन्माष्टमी थी. एक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे. बहार हम फ़कीरों की तरह खड़े हसरत से तक रहे थे. मिठाइयों की होशरुबा खुशबू अपनी तरफ खीच रही थी. सूशी ऐसे मौकों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी. वैसे तो हम दोनों बारहा एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छुपकर.

''भागो यहाँ से,'' आते-जाते लोग हमें दुत्कार जाते. हम फिर खिसक आते. फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है.

''अदंर क्या है?'' मैंने शोखी से पूछा. सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था. अदंर से घंटियाँ बजने की आवाजें आ रही थीं. जी में खुदबुद हो रही थी -हाय अल्ला, अदंर कौन है!

''वहां भगवान बिराजे हैं.'' सूशी ने गुरूर से गर्दन अकडाई.

''भगवान !'' मुझे बेइंतिहा एहसासे-कमतरी सताने लगा. उनके भगवान क्या मज़े से आते हैं. एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कौन सी रग फडकी की फ़कीरों की सफ़ से खिसक के मैं बरामदे में पहुँच गई. घर के किसी फर्द की नज़र न पड़ी. मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था. उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती आईं. मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं. मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बद्जाती आडे आ गई. सुनते थे, जहाँ टीका लगे उतना गोश्त जहन्नुम में जाता है. खैर मेरे पास गोश्त की फरावानी थी, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नुम में तो कौन टोटा आ जायेगा. नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियों आ जाती हैं. माथे पर सर्टिफिकेट लिए , मैं मज़े से उस कमरे में घुस गई जहाँ भगवान बिराज रहे थे.

बचपन की आँखें कैसे सुहाने ख्वाबों का जाल बुन लेती हैं. घी और लोबान की खुशबू से कमरा महक रहा था. बीच कमरे में एक चाँदी का पलना लटक रहा था. रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली बच्चा लेटा झूल रहा था. क्या नफीस और बारीक काम था. बाल-बाल खूबसूरती से तराशा गया था. गले में माला, सर पर मोरपंखी मुकुट.

और सूरत इस गज़ब की भोली! आँखें जैसे लहकते हुए दिए! जिद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो. हौले से मैंने बच्चे का नरम-नरम गाल छुआ. मेरा रोआं-रोआं मुस्करा दिया. मैंने बे-इख्तियार उसे उठा कर सीने से लगा लिया.

एकदम जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा. सूशी की नानी का मुंह फटा हुआ था. हाजियानी कैफियत तारी थी जैसे मैंने रुपहले बच्चे को चूमकर उसके हलक में तीर पैवस्त कर दिया हो.

चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकडा, भागती हुई लाईं और दरवाज़े से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया. फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी. अम्मा ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा. वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारेवाले मरासिम थे: इससे भी मामूली हादिसों पर आजकल आये दिन खूनखराबे होते रहते हैं. मुझे समझाया गया कि बुतपरस्ती गुनाह है. महमूद गज़नवी बुतशिकन था. मेरी ख़ाक समझ में न आया. मेरे दिल में उस वक़्त परस्तिश का अहसास भी पैदा न हुआ था.

मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी.
****
( इस्मत चुगताई : उर्दू अदब में बड़ा नाम. कथाकार. आधुनिक उर्दू कथा को आकार देने में अहम रोल. यह अंश उनकी आत्मकथा ''कागज़ी है पैरहन'' से. इससे पहले इस स्तंभ में मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा', ग़ालिब, फ़िराक़ और सफ़िया अख्तर की रचनाएं आप पढ़ चुके हैं. )
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5 November 2009

तीन अलग कवि ..तीन अलग कविताएं ....तीन अलग सोच .......

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VIVIDHA-thumb  कुछ कविताएं ऐसी होती है जब लिखी जाती है तो जाने क्या सोचकर .पर जब सामने आती है तो कई लोगो की बन जाती है ..कभी कभी सोचता हूं ...के पियूष मिश्रा क्या .."तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया "के बाद क्या उससे बेहतर लिख पायेगे ..क्या प्रसून जोशी ....तारे जमीन के बाद उसी इंटेंसिटी को दोहरा पायेगे ....कंसिस्टेंसी कितनी मुश्किल हो जाती है न.....
तीन अलग कवि ..तीन अलग कविताएं ....तीन अलग सोच .......

1  पहली कविता महेन की ……

इससे तो बेहतर है
अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी
किताबों में घुसा लिया जाए सिर
एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं
पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये
टके में जो साथ हो ले
ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें
गुलमोहर के ठूँठ के नीचे
या दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर

तुम्हे प्यार करते रहना खुद से डरने जैसा है
और डर को भुलाने के लिये जो भी किया जाए सही है।

2  दूसरी कविता नन्दनी महाज़न  जी की है ......

रफूगर आने को है



दोनों हाथ उठा कर
एक बार फ़िर से मांगती हूँ
हे पहाड़ों पर बसने वाली चील
मेरे चाक जिग़र के टुकड़े लौटा दो !
तुम्हारे बच्चे
जी भी जायेंगे उसके बिना
तुम फ़िर बनोगी
हज़ार हज़ार बच्चों की माँ
और फ़िर
मैं जब भी दुआ पढूंगी
तो मेरे लब बोलेंगे
सातों आसमानों पर तुम्हारा राज़ हो जाए
ग़र ये कल होना है
तो मेरे परवरदीगार ये आज हो जाए ।

उस नेक इंसान के लिए
ये तो मैंने ही बुनी थी मुश्किलें
उससे घर माँगा
उससे एक वर माँगा
और जो लाल रंग तुम्हारी चोंच में लगा है
उसको अपने सर माँगा

उसको बेवफ़ा न कहो
उसने किया है एक वादा
कल रात कोई रफूगर आएगा
मेरे चाक जिगर को रफू कर जाएगा

हे आसमां की शहज़ादी
लौटा दो मेरे चाक जिगर के टुकड़े
कोई रफूगर आने को है ...


 3 तीसरी  कविता गौरव सोलंकी की है ...... 

कि घर है

 

शहीद होने की एक ज़रूरी सामाजिक प्रक्रिया में
मैं ग़ैरज़रूरी ढंग से फँस गया हूं
शर्मिन्दा हूं।

बिसलेरी की पुरानी बोतल की तरह,
जिसकी विप्लवी आत्मा को
तुमने रैपर की तरह छीला है निरंतर बेवज़ह,
तुम मुझे बार बार खाली करती हो
बूंद बूंद टप टप
और किसी सीले हुए पहाड़ी स्टेशन की टोंटी पर से
फिर भर लेती हो।

या कि तुम्हारे लगातार बेघर होने की प्रक्रिया में
मैं घर हूं
तुम्हारे सरहद होने की प्रक्रिया में पाकिस्तान ?

डर और अचरज मुझे
क्रमश: नींद और भूख की तरह होते हैं।
क्या मुझे चौंकते चौंकते
हो जाना है शहर की तरह कुत्ता
और दुम हिलानी है ?
हर दुतकारे जाने के बाद करना है
पुचकारे जाने का इंतज़ार
और वे सब लम्बी रातें भुलाकर – सच
जब मैं किसी अनजान ट्रेन में चढ़कर
हो जाना चाहता था लापता
किसी लम्बी खदान में पत्थर तोड़ने को उम्र भर
- कूं कूं करके खाने हैं ब्रेड और बिस्किट
और तुम्हारी ट्यूबलाइट सी नंगी टाँगों पर टाँगें रखकर
बेताब बिस्तर पर साथ सोना है ?

नींद भर अँधेरा है
और है राख में रेत
जिसमें मैं तुमसे कहता हूं कि घर है।
लौटेंगे।
WWVF23KW44VS
इससे आगे
इन रचनाओं के यहाँ होने का मतलब
अँतर्जाल एवं मुद्रण से समकालीन साहित्य के
चुने हुये अँशों का अव्यवसायिक सँकलन

(संकलक एवं योगदानकर्ता के निताँत व्यक्तिगत रूचि पर निर्भर सँग्रह !
आवश्यक नहीं, कि पाठक इसकी गुणवत्ता से सहमत ही हों )

उत्तम रचनायें सुझायें, या भेजे !

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डा. अनुराग आर्य

अभिषेक ओझा

  • फुरसत ढूँढने में व्यस्त ! - व्यस्त होना भी अजीब है... 'व्यस्त/बीजी' मुझे बड़ा ही डांवाडोल अस्पष्ट सा शब्द लगता है.. अपरिभाषित सा. अपनी बात करूँ तो... अक्सर मैं और मुझे जानने वाले बा...
    3 days ago

भाई कूश

  • फटा पोस्टर निकला हीरो.. - फटा पोस्टर निकला हीरो.. फिल्म हीरो हीरालाल का ये डायलोग आज भी हम तब इस्तेमाल कर लेते है जब कोई धमाकेदार एंट्री लेता है... फिल्मो के कुछ डाय्लोग्स कालजयी हो...
    5 weeks ago